Search
Close this search box.

MSO 04 SOLVED ASSIGNMENT 2023 2024 भारत में प्रमुख कृषक वर्ग कौन से हैं विभिन्न समाजशास्त्रियों के योगदान के संदर्भ में चर्चा कीजिए ।

Join Us On

  1. भारत में प्रमुख कृषक वर्ग कौन से हैं विभिन्न समाजशास्त्रियों के योगदान के संदर्भ में चर्चा कीजिए ।

 

कृषि समाजों के वर्गों विश्लेषण के क्रम में 20वीं शताब्दी के पूर्व में लेने ने वर्ग विश्लेषण की मार्क्सवादी विधि का प्रयोग किया है उनकी प्रसिद्ध पुस्तक डी प्रिलिमनरी ड्राफ्ट वे क्रीम ओं थे एग्रेरियन क्वेश्चन में कृषि व्यवस्था और कृषक वर्ग के वर्ग विभेदन की विशेषण को प्रस्तुत किया है ‌।

इसी प्रकार चीनी क्रांति ने नेता माओत्से तुंग ने हाउ दो डिफरेंटशिएट क्लासेस इन रोलर एरियाज में चैन कृषक वर्ग ने विश्लेषण के अंतर्गत मार्क्सवादी संकल्पना का प्रयोग किया है बहुत कम समय में लेनिन और मानों विभिन्न समाजों में कृषक वर्ग संरचना को जानने का आधार बन गए ।

 

लेनिन व मांओ ने अपने अनुभव के आधार पर चीन एवं रस के कृषकों की विभिन्न श्रेणियां और उनके बीच एक दूसरे के संबंधों के स्वरूप को ज्ञात किया लेनिन एवं मऊ की रचनाओं के आधार पर कृषकों की श्रेणियां निम्नलिखित है ।

 

  • धनी कृषक
  • मध्यम कृषक
  • निर्धन कृषक

 

धनी कृषक – यह वह कृषक है जिनके पास प्रचुर मात्रा में अचल संपत्ति है वह बिना अपवाद के ही काश्तकारों को भूमिका एक भाग दे देते हैं जिनकी रुचि भूमि में निहित होती है आधुनिक प्रौद्योगिकी के प्रयोग द्वारा हुए भी कुछ श्रमिकों को नियुक्त करके पूंजीवादी किसान बनने का प्रयास करते हैं ।

 

मध्यम कृषक :- यह वे कृषक है जिनके पास अपने निजी भूमि कम होती है वह अपनी आवश्यकता के पूर्ति कृषि भूमि से पूर्ण करते हैं उनके पिता या परिवार के सदस्यों मजदूरी करते हैं । इस वर्ग के कृषक ना तो मजदूरी के सदृश लगते हैं और ना ही वह अन्य व्यक्तियों की भांति साधारण कार्यों में लगे रहते हैं ।

 

निर्धन कृषक :- इन कृषको के पास भी निजी भूमिका अभाव होता है यह यह अपनी आय का जीवन यापन करने के लिए श्रम करते हैं यह वर्क काश्तकार सरसबारी वर्ग है जिन्होंने पूंजीवाद के विकसित हो जाने पर अपनी भूमि गवा दी है वह धनी किसानों को अपने श्रम शक्ति बेचकर या यूं कहें उनकी सेवा करके अपना जीवन यापन करते हैं कई बार तो उनके कार्यों का अनुसार उन्हें उचित प्राथमिक भी नहीं दिया जाता है ।

 

लेनिन का विचार है कि इन श्रेणियां को अस्थाई नहीं कहा जा सकता कृषि में पूंजीवाद के विकसित हो जाने के कारण कृषक समस्ती की दो वर्गों में ध्रुवीकरण की ओर प्रवृत्ति होगी ।

इसके अंतर्गत यदि देखा जाए तो बड़े पूंजीवादी किस संख्या अर्थात सर्वहारा वर्ग की बड़ी संख्या अर्थात श्रमिक किसान इन दोनों वर्गों के हितों के परस्पर विरोधी हैं क्योंकि पूंजीपति किसानों का शोषण करके अब उनसे अधिक कार्य लेना चाहते हैं जबकि श्रमिक या मजदूर किसान अपने कार्य का पर्याप्त वेतन चाहते हैं ।

 

इन दोनों वर्गों के हिट परस्पर विरोधी होते हैं और इन दोनों के हितों को परस्पर विरोधी होने के कारण कई समझौता नहीं हो पता है मास्क इस बात की आशा करते हैं कि पूंजीवादी किस का विनास करने के लिए श्रमिक वर्ग क्रांति करेगा जिसमें सर्वहारा वर्ग को निश्चित रूप से विजय मिलेगी तथा एक नवीन समाज अर्थात श्रमिकों का शोषण समाप्त हो जाएगा यदि हम स्वतंत्रता के बाद भी भारतीय ग्रामीण वर्ग की विश्लेषण करें तो हमें चार प्रकार के वर्ग मिलते हैं । कृषि क्षेत्र में तीन वर्ग हैं भू स्वामी आदमी और मजदूर जबकि चौथा वर्ग है गैर कृषि वालों का ।

 

ए आर देसाई के अनुसार :- गोस्वामी लगभग 22 परसेंट आसामी लगभग 27 परसेंट तथा श्रमिक वर्ग के 31वें पर्सेंट लोग तथा 20% गैर कृषक हैं । किसको का एक बड़ा भाग सीमांत किसान होते हैं जिनके पास दो हेक्टेयर से भी कम भूमि होती है कुल उत्पादन के लगभग 35% किसानों द्वारा भेजा जाता है विक्रय के इन शब्दों में से लगभग 65% वस्तुएं गांव के ही व्यापारी को बेचकर व्यापार किया जाता है मंदिरों में कृषि उत्पादों का विपणन अधिकतर विक्टोरिया के हाथों में होता है जो की वस्तु व्यक्तिगत हितों का प्रतिनिधित्व करते हैं । 

 

वह ही ऋण प्रदान करने के साथ-साथ उत्पाद की बिक्री यानी दोनों की सुविधा का नियंत्रण करते हैं इस प्रकार बड़ी संख्या में श्रमिक जीवन भूमि की गैर आर्थिक उपयोगिता वाले भूमि के बड़ी संख्या में स्वामित्व तथा क्रम संख्या में शिल्पी स्वरोजगार में लगे लोग ग्रामीण क्षेत्रों में ग्रामीणों के दुखद आर्थिक जीवन को दर्शाते हैं कृषि संरचना के अंतर्गत हम कृषि संबंधों की विषयों का विश्लेषण करते हैं यह संबंध में लगे लोग इस प्रकार वर्गीकृत किया जा सकते हैं ।

 

  • वह जो कानून द्वारा परिभाषित और क्रियान्वित है
  • वह जो रूड़ीबद्ध हैं
  • हुए जो अस्थिर है

 

डेनियल कॉर्नर तथा दीपांकर गुप्ता – ग्रामीण क्षेत्रों में तीन वर्गों में वर्णित गोस्वामी आसामी और मजदूर कृषक इस वर्गीकरण को इन्होंने अस्वीकार किया है उनके तर्क के आधार था कि तीनों वर्ग में एक समय में एक ही व्यक्ति हो सकता है एक व्यक्ति अपने स्वामित्व की कुछ एकड़ भूमि आसामी को किराए पर दे सकता है संकट की घड़ी में दूसरों की खेती में मजदूर की तरह काम कर सकता है उन्होंने कृषि संबंधों का विश्लेषण तीन शब्दों में प्रयोग के माध्यम से किया है कृषि जिम्मेदारों के लिए मलिक कृषि का काम करने वालों के लिए किसान और खेती श्रमिकों के लिए मजदूरी 

 

मालिक अपनी आय भूमि उत्पादकों के हिस्से में से प्राप्त करता है यह हिस्सा नगर और वास्तु के रूप में भी वसूल किया जाता है वह अपनी भूमि आसामी को दे सकता है या दैनिक मजदूर रखने वाले लोग जो छोटे भूमि स्वामी या आसामी हो सकते हैं मलिक दो प्रकार के होते हैं अनुप्रस्थित जमींदार और जो इस गांव में रहते हैं जहां पर उनकी जमीन है किसान जो काम करने वाले लोग होते हैं किस की गए बहुत कम होती है उनके परिवार के सदस्य स्वयं भूमि परिश्रम करते हैं और अपनी आजीविका चलाते हैं 

 

वह अपना प्रसन्रमिक  नगद और कभी-कभी वास्तु को मजदूरी के रूप में प्राप्त करते हैं जब उन्हें ग्रामों में काम नहीं मिलता तब वह अन्य राज्यों में चले जाते हैं या तो कृषि मजदूरी करके या निर्माण एवं औद्योगिक मजदूर के रूप में काम करने चले जाते हैं ।

 

डेनियल थोर्नर – मैं तीन उदाहरणों पर कृषि सामाजिक संरचनाओं के तीन वर्गों का विश्लेषण किया है 

 

  1. भूमि से प्राप्त आय अर्थात किराया स्वयं की खेती से आय या प्राथमिक से।
  2. अधिकारों की प्रकृति जैसे स्वामित्व बताई और बिना किसी अधिकार के कार्य करना
  3. किए गए वास्तविक कार्यों सीमा अर्थात कार्य पूर्ण नाव करना थोड़ा कार्य पूर्ण करना और दूसरों के लिए काम करना।

 

धनी कृषक और व्यापारी रेड दाताओं ने आदमियों और भूमिहीन मजदूरों का इतना शोषण करते हैं कि उनके बीच के संबंध सदैव कटु रहते हैं उनके पास काफी आर्थिक सामाजिक और राजनीतिक शक्ति होती है गांव में सहकारी और रेड स्मृतियों के उदय ने निसंदेह मालिकों की शक्ति पर प्रभाव डाला है फिर भी वह मजबूत बने हुए हैं

 

गांव में इन बातों का विशेष ध्यान रखना चाहिए गांव में सरकारी समितियां अधिक सफल नहीं हो पाती हैं निजी व्यापारी सफलता से कार्य कर रहे हैं स्वार्थी लोग यथा स्थिति बनाएं रखने का प्रयास करते हैं यहां तक की भूमि सुधारो से भी मालिकों और महाजनों की शक्ति काम नहीं हुई है जब तक ग्रामीण क्षेत्रों में आर्थिक सामाजिक और राजनीतिक उभांति नहीं होती तब तक उत्पादन के अधिक समान वितरण के लिए कोई आंदोलन नहीं चलाया जाता जब तक की छोटी रसोइयों को आर्थिक बोल नहीं मिलता जिम कि वह बड़े कृषकों और महाजनों तथा व्यापारियों के दबाव का मुकाबला कर पाए तब तक वर्ग संबंध के सुधार करने में कोई सफलता प्राप्त नहीं हो सकती कृषि श्रमिक जांच मुख्ता कुछ आर्थिक पंखों से संबंध थी लेकिन सामाजिक नियोग्यताएं तथा अधिकतर कृषि मजदूरों की निम्न सामाजिक स्थितियां भी समस्या का काम महत्वपूर्ण भाग नहीं है अधिकांश अनुसूचित जाति पिछड़ी जाति तथा अनुसूचित जनजाति के होते हैं अतः यह हो सकता है उनकी कुछ कमियां सरकारी आरक्षण नीतियों के कारण समाप्त हो गई हो फिर भी उनकी आर्थिक एवं सामाजिक स्थितियों में सुधार नहीं हुआ है गांव में उन्हें सामाजिक जीवन का हिस्सा नहीं माना जाता है कृषि समाजों के वर्ग विश्लेषण के क्रम में 20वीं शताब्दी के पूर्व में लेनिन ने वर्ग विश्लेषण की मार्क्सवादी विधि का प्रयोग किया है उनकी सुप्रसिद्ध पुस्तक डी प्रिलिमनरी ड्राफ्ट वे किसीसेस ओं थे एग्रेरियन क्वेश्चन में कृषि व्यवस्था और कृषक वर्ग के वर्ग विभेदन का विश्लेषण प्रस्तुत किया है इसी प्रकार चीनी क्रांति ने नेता माओत्से तुंग ने हो तो डिफरेंटशिएट क्लासेस इन रूलर एरियाज मे चीनी कृषक वर्ग के विश्लेषण के अंतर्गत मार्क्सवादी संकल्पना का प्रयोग किया है बहुत कम समय में लेनिन और मां विभिन्न समाजों में कृषक वर्ग संरचना को जानने का आधार बन गए ।

 

x

Leave a Comment